सोमवार, 26 सितंबर 2016

टिकाऊ विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals)

आज यून महासभा को संबोधित करते हुए हमारी विदेश मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज ने अपने भाषण के पहले हिस्से में टिकाऊ विकास एजेंडे का जिक्र किया.. तो क्या हैं ये टिकाऊ विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals)..??
25 सितंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र संघ में देशों ने एक नए टिकाऊ विकास एजेंडा के हिस्से के रूप में गरीबी समाप्त करने के लिए, हमारे ग्रह की रक्षा करने और सभी के लिए समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्यों के एक समूह को अपनाया। प्रत्येक लक्ष्य का एक विशिष्ट उद्देश्य है जिसे अगले 15 बरसों में हासिल किया जाना है।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हममें से हर एक को इस मुहिम का हिस्सा बनने की जरूरत है, फिर वो चाहे सरकारें हों, निजी क्षेत्र हो या सिविल सोसाइटी या फिर हम आप।
इसमें शामिल होने की पहली शर्त इस विचार, उद्देश्य और इसके लक्ष्यों को हर एक व्यक्ति तक पहुंचाना है। हम इसमें अपने दैनिक जीवन में थोड़े से बदलाव करके योगदान कर सकते हैं। कमाल की बात यह है कि हमारा योगदान हमें तय करना है। ये उतना ही जरूरी है जितना कि हमारे अपने बच्चे..क्योंकि ये सारी कवायद सिर्फ इसलिए है जिससे कि हमारे नौनिहालों को और आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर समाज, देश व दुनिया मिल सके।
ध्यान रहे कि सिर्फ हमें अपने हिस्से का योगदान देना है और दूसरों को उनके योगदान की जिम्मेदारी का सविनय ध्यान दिलाना है।
कुल मिला कर 17 लक्ष्यों का निर्धारण हुआ है, जो प्राथमिकता के आधार पर निम्म क्रम में हैं -
1. शून्य गरीबी
2. शून्य भुखमरी
3. अच्छा स्वास्थ्य व जन कल्याण
4. गुणवत्तापरक शिक्षा
5. लैंगिक समानता
6. स्वच्छ पानी व स्वच्छता
7. किफायती व स्वच्छ ऊर्जा
8. समुचित कार्य व आर्थिक प्रगति
9. उद्योग, नवाचार व बुनियादी ढ़ांचा
10. असमानता में सतत कमी
11. टिकाऊ शहर व समुदाय
12. उत्तरदायी खपत और उत्पादन
13. जयवायु संबंधी कार्रवाई
14. जल के भीतर जीवन
15. जमीन पर जीवन
16. शांति, न्याय व मजबूत संस्थान
17. इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए साझीदारी
अगली ब्लॉग पोस्ट में हम चर्चा करेंगे कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हम व्यक्तिगत तौर पर क्या योगदान कर सकते हैं?

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

क्यों नहीं हो सकी और क्यों संभव नहीं है भारत में वाम क्रांति...



मेहनत, व्यापार, जोखिम व लाभ-हानि..ये चार ऐसे शब्द हैं जिनको जीवन में उतारने वाला किसान व व्यापारी बनता है, उद्यमी बनता है और अंततः सफल हो पूंजी का निर्माण करता है। लेकिन भारतीय वामपंथियों और समाजवादियों को इन चारों (मेहनत, व्यापार, जोखिम व लाभ-हानि) अल्फाज़ों से नफरत हैं। उनको नफरत इसलिए हैं कि वे मैकाले पद्धति के पढ़े-लिखे और वेतनभोगी होना पसंद करते हैं। वे किसान, मजदूर नहीं होना चाहते...वो उनके लिए आवाज़ उठाने वाले बनना चाहते हैं। वो जानते हैं कि किसान या व्यापारी बनने का मतलब है - बरस-दर-बरस सर्वस्व दांव पर लगाना...लेकिन इतना बड़ा जोखिम और साहस करने योग्य होते तो वही न कर रहे होते न?
ये बस अपने भय से आपको डराते हैं, इनका भय भी एकमात्र यह है कि देश-समाज में वह पक्ष हावी न हो जाए जो इन कामचोरों और गैरजिम्मेदार लोगों को काम करने और मेहनत करने पर मजबूर कर दे। जो इनको इनके कंफर्ट ज़ोन से बहार घसीट कर परेशान न कर दे। ये धर्म और दक्षिणपंथ को अफीम और फासिस्ट बता कर उनका भय दिखा कर खुद को स्थापित करते है। ये आज़ादी की मांग करके लोगों को सब्जबाग दिखा कर खुद को स्थापित करते हैं और जब सत्ता में आते हैं तो अपने चारों ओर दीवारें खड़ी कर लेते हैं और लग जाते हैं उस सुंदर समाज के प्रचार में जो दीवार के उस ओर होना बताया जाता तो है, लेकिन वास्तविकता में होता नहीं है। यही कारण है कि पूरी दुनिया का एक भी ऐसा वामपंथी विचारधारा वाला देश न हुआ जो दीवारें गिरने पर अंदर से लुटा पिटा न निकला। वहां पर लोगों को रोटियों के लिए भी लाइन लगाए, भुखमरी और गरीबी से मरता दुनिया ने देखा है।

आखिर वहां पर भी धर्म और दक्षिणपंथ का भय दिखा कर ही सत्ता हासिल की गयी थी....किसके लिए? सर्वहारा के लिए, आज़ादी के लिए (अरे वही कन्हैया टाइप्स) और अंततः क्या हुआ... स्टालिन, चाऊशेस्कू वगैरह पैदा हुए जो और बड़े आदमखोर थे (तो अब तो उदाहरण भी नहीं कि बता सकें कि देखो वो रहा हमारा मॉडल जो सफल है)। इसीलिए ये बस पैदा होने से मरने तक आलूचना बेचते आई मीन आलोचना करते रहते हैं।


ये दरअसल उस कला आलोचक जैसे होते हैं जो आलोचना तो खूब करता है लेकिन जब ब्रश पकड़ा दिया जाता है तो सारी आलोचना फना हो जाती है। ये आलोचनाएं तो खूब करेंगे और जब आप इनसे संशोधित योजना की बात करेंगे तो ये बगले झांकने लगेंगे। इनके पास दरअसल कोई सफल योजना जैसी चीज है ही नहीं। ये तो बस क्रांति के हवा-हवाई महल और समानता के गीत गाते स्वप्नजीवी होते हैं। जिनका हकीकत से बस इतना वास्ता होता है कि धंधा-पानी बरकरार रहे।



दिल्ली व अन्य राजधानियों में बैठे कर क्रांति की दंड-बैठक पेलने वाले अधिकांश वामियों और समाजवादियों की पृष्ठभूमि या तो ग्रामीण होगी या सफल वामी (स्थापित व कमाऊ वामी) परिवार की मिलेगी। अभी हाल में दिल्ली में आज़ादी के लिए स्यापा पीटने वाले लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि यही है। इनको मुफ्त आवास, भोजन और नशा-पत्ती मिल रहा है तो माँ-बाप के पास जा कर खटने की जरूरत किसे है? 



ब ऐसे लोग अगर किसी देश में समाज में परिवर्तन और क्रांति का बीड़ा उठाएं होंगे तो 90 क्या, 900 क्या, 9000 बरस नहीं होनी क्रांति क्योंकि कारण साफ है। ये चाहते ही नहीं समाज में परिवर्तन ये तो बस अपने आरामतलब, गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और कामचोरपने वाली जिंदगी को जीते रहना चाहते हैं। 

मजे की बात तो यह है कि ईश्वर को न मानने वाले वामपंथी, प्रकृति में भी यकीन नहीं करते हैं। क्रांति की इनकी प्रिय अवधारणा - स्पॉन्टेनियस है। वह परजीवी क्रांति-बेल जो जिस पेड़ पर चढ़ जाए उसे नष्ट कर दे। JNU इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। जिस विश्वविद्यालय को 'राष्ट्रीय एकता और अखंडता' (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम 1966) को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाया गया उसी का नाश करने पर तुले हैं। काश्मीर को स्वतंत्र कराने के लिए सर्वस्व निछावर करने वाले ये लोग दूसरी ओर राष्ट्र की अवधारणा को ही नकारते हैं। 

इतना अधिक कन्फ्यूज है भारतीय वामपंथ, कि तय ही नही कर पाता किस फाइनांसर के साथ खड़े हों। वो कभी कांग्रेस से वित्तपोषित होता दिखता है तो कभी सरहद पार से। भारत में अपनी पैदाइश से लेकर आज तक इस विचारधारा ने जितनी वल्दियत बदली है उतनी बार तो सांप आपने जीवन में केचुंल नहीं उतारता और गिरगिट रंग नहीं बदलता। कहने का तात्पर्य यह है कि इनको सिर्फ और सिर्फ अपने से मतलब है। अपने से अर्थ है - खुद से (विचारधारा समूह से नही)। ये लाभ के लिए आपस में भी कुत्ता-घसीटी कर डालते हैं। जलेस और प्रलेस के झगड़े और उससे भी पहले वामपंथियों का आपसी विभाजन इसके कुछ एक उदाहरण हैं। ये विशुद्ध रूप से अपने तक सीमित लोगों का एक समूह है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही एकजुट होता है और किसी के भी साथ खड़ा सकता है, किसी के भी साथ।

पहली आज़ादी तो वे खुद से तय कर निकले हैं, दुखी व गरीब माँ बाप से आजादी, उनकी जिम्मेदारी से आजादी। और ये वो लोग हैं जो समाज में क्रांति की जिम्मेदारी उठाने निकाले हैं। जो स्थापित परिवारों से हैं उनके लिए तो यह पेशा है। फटहा झोला लटका कर खुद के आरामतलब, गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार (सामाजिक संबंधों से इसीलिए भागते हैं, यू नो लिव इन रिलेशन वगैरह) और कामचोरपने को क्रांति के लबादे से ढ़ंक कर रखना। ये दोनो ही वे लोग है जो हसिया या हथौड़ा दोनो ही उठा कर आठ घंटे काम कर लें तो हसिया और हथौड़ा दोनो शर्म से धरती में धंस जाएं।


ये दरअसल भिन्न-भिन्न कालखंडों में हरामखोरी की जीवनशैली के हामी लोगों का एक कुनबा भर है (70 के दशक के हिप्पियों जैसे)। 

सो जिनका लक्ष्य ही क्रांति नहीं है वो क्या करेंगे क्रांति?


रविवार, 6 मार्च 2016

रोहित वेमुला और समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब विद्यार्थियों के लिए मगरमच्छी आँसू बहाने वाले राजनीतिक दलों की असली नीयत का जीता-जागता उदाहरण है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का प्रवेश

दो बरस पहले आरक्षित सीट पर किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारते हुए एडमीशन लेने वाले और दिलाने वाले सवर्ण लोगों को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्षा के एडमीशन पर क्या कहना है? इलाहाबाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है - उनका उत्पीड़न इस लिए हो रहा है क्योंकि उन्होने योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम का पुरजोर विरोध किया था - और कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि दो बरस पहले के इस प्रकरण पर आज कार्रवाई क्यों?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा जी कृपया ये बताएं कि दो बरस पहले आपने किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारा तब आपने उनके उत्पीडित होने के बारे में क्यों न सोचा? आज आपको अपने उत्पीड़न की चिंता हो रही है? समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के उन विद्यार्थियों के साथ हो रही ज्यादती का विरोध तक क्यों नहीं किया? आपको लाभ हो रहा था इसीलिए न?  यही एक कारण हो सकता है। आप जानकार न थी यह कोई वजह नहीं हो सकती, और अगर उस (जानकारी न होने के) कारण को मान भी लें तो आज आप उस गलती को सुधारने का बजाए राष्ट्रपति को पत्र लिख कर आदर्श संघर्ष के किस मानक की स्थापना कर रही हैं? आप विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक ऐसी अध्याक्षा हैं जिसने समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के विद्यार्थियों का हक मारा है। और तो और हमने सुना है कि हरिजनों और ओबीसी के लिए ज़ार-ज़ार रोने वाले कांग्रेसी और वामपंथी दलों ने आपका चुनाव में समर्थन भी किया था?

और वे लोग जो दो बरस बाद की जाने वाली संभावित जांच पर सवाल उठा रहे हैं तो उनसे मेरा यह पूछना है कि वे किस परम्परा को जन्म दे रहे हैं क्या त्रुटि या अपराध का पता लगने पर उसके सुधार या दंड का प्रावधान करने से पहले यह देखना चाहिए कि वह कितने पहले हुआ था? यानी कि पुरानी घटी घटनाओं और हादसों के लिए उत्तरदायी जीवित लोगों को मात्र इसलिए बक्श दिया जाना चाहिए कि वह घटना पुरानी हो गयी? क्या किसी पीड़ित और सताए हुए गरीब घर के विद्यार्थी के हक मारने वाले और फिर पकड़े जाने पर इधर-उधर के बहाने लगाकर उत्पीड़न का आरोप लगाने वाले को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए कि उसका एडमीशन दो बरस पहले हुआ था (भले ही गलत तरीके से हुआ हो)।

मैं मानता हूँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का कैरियर भी दांव पर है और वे भी विद्यार्थी भी है लेकिन उनके आरोप-प्रत्यारोप भरे व्यवहार से स्पष्ट है कि उन्होने अपना कैरियर चुन लिया है। सो वे बेहतर स्थिति में हैं कि अपने सही और आदर्श निर्णय से समाज में एक नई राजनीतिक और सामाजिक न्याय से ओतप्रोत पहल का उदाहरण प्रस्तुत करें। यह पहल कैसी होगी, ऐसी होगी या वैसी होगी... इसे देश के युवाओं को इस्तेमाल करने वाली राजनीति तय करेगी या वे स्व-निर्णय लेंगी... आने वाला समय ही बता पाएगा।







शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव

आज के भारतीय समाज में व्याप्त भेदभाव के मसले पर अधिकांश लोकप्रिय दलित चिंतक आपको टकराव की ओर ले जाते दिखेंगे, लेकिन समाज में व्याप्त भेदभाव पर सकारात्मक सुझाव और सुधार की पहल करता कोई न दिखेगा। हमारे आपके दर्शनार्थ इन सभी के आदर्श, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर या मान्यवर कांशीराम दिखेंगे, लेकिन कोई उनके जीवन संघर्ष को जीने की इच्छा रखता न दिखेगा।
मेरा मानना है कि इसका एक ही कारण है। समाज सुधार एक प्रकार की साधना है जो पूरा समर्पण मांगती है, लेकिन जब इसे व्यवसाय बनाने की लालसा हो तो जो लालसा होगी वही सिद्ध होगी न?
सरल सी बात नहीं समझ आती हम लोगों को कि समाज के किसी तबके को समाप्त करके इस समस्या का हल संभव नहीं है। समाज के हर हिस्से को इसके लिए जागृत होना होगा। इस समस्या से संघर्ष नहीं, समग्र सुधार की भावना से ही निपटा जा सकता है। लेकिन ये दलित चिंतक जानते हैं कि अगर समाज की समझ में यह बात आ गयी तो इनकी रोजी रोटी ही बंद हो जाएगी। इनके इस कुचक्र को समझना होगा और इसे भेदना होगा। हमें समझना होगा कि समाज सुधार में नेतृत्व का काम समाज को तैयार करना होता है, समाज में भेद पैदा करना नहीं। सो उत्तरदायित्व हमारा है। मुझे तो यह समझ आता है कि जिस दिन कर्म के आधार पर समाज में कर्म के महत्व की पुनःस्थापना की शुरुआत होगी, उस दिन से समाज में फैले इस भेदभाव को सुधारने की ओर हम पहला कदम बढ़ा देंगे।
दरअसल यह या किसी भी तरह का भेदभाव एक सड़ांध भरा नाला हैं जो समाज के बीचो-बीच बह रहा है, उसके लिए हर घर जा कर घरों के मुखियाओं को समझाना होगा कि इस नाले में अपने घर के हिस्से की सड़ांध डालना बंद करें और यह एक दो या दस बरस में होने वाला काम नहीं है। घरों तक जाने की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि देश की मूल इकाई घर-परिवार ही हैं। 
जबकि आज के अधिकांश दलित चिंतक तो बस इस नाले से अपने हिस्से की खाद और गैस को बेच कर ऐश कर रहे हैं।
सो सारांश यह है कि हम इस समस्या के समाधान के लिए अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन करें तब ही इस समस्या का सामना किया जा सकता है।


शनिवार, 3 जनवरी 2015

"इम्पोर्टेड बाबा"

यारब न वो समझे हैं न समझेंगे तेरी बात,
उनके दिमाग पर कुंडली, बाबा धरे जनाब।
भारत के नाम से, उनको आती रही मिर्गी,

हिन्दोस्तां सेक्युलर है औ इंडिया है फ्रेंडली।
बाबा ने कहा था कि बनाएंगे सबको एक,
गदहे बनेंगे घोड़े और फिर बनेंगे कामरेड।
आएगी मियां जोर से जब क्रांति झमाझम्म,
राजा बनेंगे लुल्ल, और फटीचर चकाचक्क।
ऐसा करेंगे वो कि, वैसा करेंगे वो,
हाथी मारेंगे और चीता फाड़ेंगे वो।
एक्सपेरिमेंट रशिया में तभी फेल हो गया,
विस्फोट होय गया औ कुनबा बिखर गया।
हालत खराब हो गयी औ हाजत हुई खराब,
केवल बचा है कच्छा औ कपड़े सभी खराब।
कुछ बरस चिपके रहे, पंजे का बनके जोंक,
सवाल पूछने का बस अब पाल लिया शौक।
हंसिये हथौड़े से अब तौलते हैं सबका काम,
बाबा अभी भी सिर पे बजते हैं सुबो-शाम।
 ‪#आशुवाणी

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

अटल बनाम मोदी - खुद के आगे बीन बजाता मीडिया!

कल चैनलों पर यायावरी करते हुए एनडीटीवी पर अभिज्ञान जी को देखा, साथ में टंडन जी (अटल जी के मीडिया सलाहकार) को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ, सो रुक कर सुनने लगा।

10-15 मिनट में ही अभिज्ञान की लाचारगी पर तरस आने लगा - विषय था - भारत रत्न मिलने पर अटल जी के गुणों का विश्लेषण..अभिज्ञान अपनी पीड़ा को परदे में लेते हुए बिना नाम लिये अटल जी की तुलना मोदी जी से करने लगे कि.."एक अटल जी थे और एक आज के नेता है।" टंडन जी ने लगभग झिड़कते हुए (अटल जी के स्तर से वह झिड़कना ही था) कहा कि - अटल जी की मोदी जी से तुलना करने से पहले एक किस्सा सुन लीजिए..."प्रभाष जोशी जी उस दौरान जनसत्ता के संपादक थे जब अटल जी पीएम थे और जोशी जी एक साप्ताहिक कॉलम लिखते थे - 'स्वयंसेवी प्रधानमंत्री' और मजाल है कि अटल जी उस कॉलम को पढ़ना भूल जाए (ध्यान रहे कि अटल जी और जोशी जी घनिष्ठ मित्र थे)। जोशी जी का पत्रकारिता में क्या कद था यह बताने की जरूरत किसी को नहीं है। अटल जी उनको इसलिए पढ़ते थे क्योंकि वह वादविहीन आलोचना थी, तटस्थ और रचनात्मक थी। आप खुल कर नाम लीजिए कि आप मोदी जी की तुलना अटल जी से कर रहे हैं। ऐसे में जिस शख्स को 40 बरस मीडिया का प्यार मिला हो उसकी तुलना ऐसे शख्स से करना जिसे मीडिया ने 12 बरस तक बायस्ड हो कर किनारे लगाने का प्रयास किया और नतमस्तक हो गया (मीडिया का आज का सुर देख लीजिए)।"

माफ करिएगा लेकिन... क्या प्रभाष जी जैसी पत्रकारिता का पसंगा भर भी करने वाला कोई पत्रकार आज मीडिया में है?

पत्रकारिता में प्रभाष जी के चेले उसी तरह से हो गए हैं जैसे राजनीति में जेपी के चेले। उनमें इस बात की होड़ लगी रहती है कि वे कैसे सिद्ध करें कि वे प्रभाष जी के कितने नज़दीक और प्यारे थे...लेकिन इनमें से कोई भी आत्ममुग्धता और समझौतों से मुक्त नहीं हैं। "मैने जीवन में पेश के लिए कभी किसी तरह समझौता नहीं किया" - जब कोई पत्रकार, संपादक ऐसा बोलता है तो सुनने पढ़ने वाला हर शख्स जानता है कि सामने वाला क्या कहना चाहता है। इन चेलों को लगता है कि प्रभाष जी को लोग जानते नहीं है। उन्होने कभी भी ऐसा दावा नहीं किया, क्योंकि उनको ऐसा करने की जरूरत ही नही थी, उनके कर्म उनकी लेखनी बोलती थी।

ऐसे में मेरे मन में सवाल पैदा हुआ कि अभिज्ञान मोदी जी से अटल जी जैसा बनने की अपेक्षा करते हुए, यह अपेक्षा क्यो करने लगे कि उनको प्रभाष जोशी जी जैसा समझा जाए। क्या तुलना है? है भी या नहीं? पिछले कुछ बरसों में राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति उपजी नकारात्मकता का श्रेय लेने को यह मीडिया तैयार नहीं है लेकिन प्रबल और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व के उभार के कारण युवाओं में फिर से राजनीति के प्रति उभरती सकारात्मकता को लेने का श्रेय इस मीडिया को जरूर चाहिए। ऐसे गैरजिम्मेदार मीडिया की स्थिति हमारे देश के बड़े बाबुओं सरीखी है जो अधिकारों की तो बात करता है लेकिन उत्तरदायित्व से भागता है। फिर तुलना कैसी, किसकी और क्यों? सिर्फ कार्यक्रम बनाकर अपना चेहरा चमकाने के लिए। क्या मज़ाक है!

जब आप तुलना करते हैं तो उसका आधार क्या होता है, या बस 30 मिनट के कार्यक्रम को निपटाने बैठ जाते हैं। अंत करते हुए अभिज्ञान कहते हैं कि अटल जी उनको प्यार से 'अभिज्ञान शांकुतल' बोलते थे। बोलेंगे ही...लॉलीपॉप बच्चों को दिया जाता है, उनको पता है कि सामने वाला किस टॉफी को पकड़ कर ज़िंदगी भर चूसरा चुगलता, मगन रहेगा। जब आप जैसे पत्रकारों से भरा दृष्य मीडिया- 'राजधर्म निभाएं' जैसे वाक्य को बोलते समय अटल जी के मंतव्य को भाव को और संदेश को न समझ सका और अपने मन की व्याख्या को लेकर कल का थूका आज चाट रहा है तो समझा जा सकता है तुलना और तुनलात्मकता की कितनी समझ इस मीडिया को है।

यह तो एक उदाहरण था, इसी तरह के विश्लेषण कमोबेश हर चैनल पर थे...हिन्दी, अंग्रेज़ी दोनो!

रविवार, 24 अगस्त 2014

किरांति के वास्ते.....

चेहरा बना है लाल, किरांति के वास्ते,
उनका बढ़ा है बाल, किरांति के वास्ते।
दाढ़ी में है ख़िजाब, किरांति के वास्ते,
झोले में है हथियार, किरांति के वास्ते।
गुदड़ी के बने लाल, किरांति के वास्ते,
मुर्गे भी हैं हलाल, किरांति के वास्ते।
उंगली में है सिगार, किरांति के वास्ते,
हाथों में है गिलास, किरांति के वास्ते।
वोटर किया आयात, किरांति के वास्ते,
मइया को मारी लात, किरांति के वास्ते।
अनुदान लिया खाय, किरांति के वास्ते,
खा करके मारी लात, किरांति के वास्ते।
धरना है कारोबार, किरांति के वास्ते,
कुर्सी की है दरकार, किरांति के वास्ते।
कच्छे में रखा रुमाल, किरांति के वास्ते,
गिरगिट सा है जमाल, किरांति के वास्ते।
कारखाने कब्र हो गए, किरांति के वास्ते,
मजदूर दफन हो गए, किरांति के वास्ते।
क्या-क्या करोगे यार, किरांति के वास्ते,
रस्ते किए सब बंद, किरांति के वास्ते।
भेड़िए ने पहनी खाल, किरांति के वास्ते,
कब तक चलेगा स्वांग, किरांति के वास्ते?  - आशु वाणी 

रविवार, 26 मई 2013

पत्नी की आँख, भेड़िये की आँख(वाईफ आई, वुल्फ आई), लेखक - बेंजामिन रोसेनबाउम

मेरा पहला और अंतिम साहित्य अनुवाद....

लड़ाई नदी के उस पार और जंगल से बाहर की ओर मुड गयी.गौरैयों की लड़ाई पेड़ और फर के बीच की तंग जगहों से निकल कर सिकु़डती सी बाहर आ गयी. एक सर्द बादल, एक भेड़िये की लम्बी आह, भोर में पक कर फूटने को तैयार जगमगाती ओस की बूँदें, वे फूट कर धुंध में मिल रही हैं.

घड़ी समय के साथ चलती जा रही है, दादी माँ रजाई में लिपटी सो रही है, उन दीवारों के बीच, जो नीचे गिराई नहीं जा सकती, सिमटी हुई हवा में गहरी साँसे भर रही है. उसकी इस यात्रा के रास्ते में कोई भी सीमेंट, चौखट, ईंट या पत्थर,हिरन या गौरैया नहीं आ रहे थे. और तो और भेड़िया भी वहां नहीं आ रहा था.


इस बात की संभावना नहीं है कि आत्मीयता भरी हरी आंखें, जिनका एक अपना कमरा है, जिसमें एक आराम कुर्सी है, मिट्टी की गुड़िया है, और भट्ठी पर रक्खी एक थाली है वहां एक भेड़िया आये और वार्निश की हुई मेज के अंत में टंगे काक-भगौड़े को सूंघे. उनके धूसर कोट पर पडी बर्फ की कोई भी सिलवट पिघले और बूँद बन कर झालरदार कालीन पर गिर पड़े - ऐसा नहीं हो सकता.


वहाँ कोई भेड़िया नहीं है. यह तो उसकी पोती है जो कि एक लाल कनटोप, पहन कर आती है. वो चाहती है कि वो चली जाए और उसे छोड़ दे, वो उसे कतई पसंद नहीं करती है, ये एक अजीब सा संदेहास्पद इंसानी व्यवहार है. रिटालिन की प्रतिक्रिया के चलते, जैसे एक झूठ हो, कोई भेड़िया नहीं है.


आवाजें जो घर के सामने एक मोटर के पार्किंग के स्थान पर उसके रुकने से पैदा होती हैं, और फिर कार के दरवाजे के बंद होने की आवाज़.


तीखे ठण्ड के मौसम में नंगे हो रहे रहे जंगल के बीच दादी के घर ने अपनी पहचान को बनाए रखा था. रोशनदान, छत का कोना, धुंधलाया शीशा, खंभे और शहतीर, सत्रह घड़ियों (एक अज्ञात चीड के पेड़ की हाथों से बनी है, एक जापानी देवदार की बनी हाथ से बनी, एक हाथ के बने नर्म लोहे से बनी,एक बैटरी चालित अलार्म घड़ी चेरी की लकड़ी की मेज के ऊपर और मेहमानों के कमरे के बिस्तर के बगल में है, इसकी सुई काले प्लास्टिक की हैं), समाचार पत्र और आग के लिए लकड़ी, फायरप्लेस के साथ ढेर बने रखे हैं.दूर देखने वाले चश्मे में चेन लगी है, मुख्य दरवाजे पर बूट रखे हैं(इनमे से एक जोड़ा पुरुषों के बूट का है, जो ऐसा लगता है कि विषयासक्त शताब्दी से पहले की सदी से खाली रखे हुए है भले ही ये पक्के तौर पर वही सदी थी जो घाव बन गयी, जो भेड़िये की विलक्ष्णता के अलावा सब कुछ बदल गयी), सिलाई का डिब्बा जिसमें सभी आकार के ढेरों बटन थे, कद्दूकस, अंडा काटने वाला, आलू मसलने वाला, खाना पकाने के बर्तन से भरीं दो दराजें(अल्मूनियम या स्टील के), लोहे की देगची, शीशे का जार जिस पर नीले बीड, खिड़की से आ रही रोशनी से दमक रहे थे, पूरा वातानुकूलित, 53 सालों के टैक्स के कागज करीने से बक्से में करके तहखाने में रखे हुए, झाड़ू झाड़न और एक वैक्यूम क्लीनर 22 कैलीबर का हथियार जो तहखाने की सीढियों के नीचे की अल्मारी में रखा है जहाँ दादी माँ अब कभी नहीं पहुंच सकती है. ये सारी चीज़ें मिलकर एक व्यवस्था बन जाती हैं, और उनके सामने जंगली भेड़ियों से भरे जंगल दूर तक पीछा करते हैं.


जब बूढा जीवित था, घड़ी की टिक टिक,शांत और सुरक्षित घर उसे तृप्त रखते थे, और बर्फ की चादर से ढकी दुनिया, जो चौड़ी हो रही दाढ से निकल रही कूकने जैसी आवा़ज़ करती थी, उसे संतुष्ट रखती थी. उसके गर्म हाथ में अपना हाथ रख कर, खिड़की के वितान से बर्फ के तूफान को सफेद तकिये बनाते देखते रहना. दादी माँ के लिए, बर्फ के ढेर से अटी पड़ी जमीन में शाहबतूत के बीज ढूंढने की कोशिश करना, सदाबहार की तीखी पत्ती से घायल होना, और शीतदंश से पीड़ित होना, सब सही था. घर जंगल में इकदम शांतिपूर्ण था, और उसके हाथ अपने दस्ताने में शांत, और खतरे में भी थे ये एक सुरक्षित जगह थी.
बूढे की मौत के बाद, करीब आधी सदी से असुरक्षा सब कुछ खाली किये जा रही थी. पहले की स्थिति मे वापस जा पाना उसके लिये अब संभव नहीं था. दादी भेड़ियों को याद करती थी.


पीछे का दरवाजा थरथरा के खुला, और पोती ने बाहों के बोझ को उतारना शुरु किया. युवा आवाज में एक गीत उभरा.
"भगवान उस बच्चे को आशीर्वाद दे जिसका अपना... ~"


उसकी पुरानी आवाज अब कफ़ से भरी हो गयी है, और दादी माँ बिस्तर पर अपने बदन को एक बेहद गर्म कंबल में लपेटे हुए सिर्फ धुआं उलीचती रहती है. वो बूढे को देखने के लिये अपनी गर्दन घुमाती है, लेकिन कह नही सकती कि वो वहां था.


मौत और हार के बाद भेड़ियों को भगाना बंद हो गया, और मरदाना पोती ने फर्नीचर बाहर कर दिया, गृहयुद्ध से अवकाश प्राप्ति के फ्रेम किये कागजात, 80 साल पुरानी क्रिस्टल की मिठाई की ट्रे और तीन मस्तूलों वाली क्लिपर नौका का लिथोचित्र, साथ ही बेरहमी से बड़े पैमाने पर बनी स्कैंडिनेवियाई गद्देदार कुर्सी जिसके हत्थे को एक एल आकार के पाने में बदल दिया गया था, सबको एक घरेलू सेल लगाकर बेच डाला, और सुई वाली घड़ी को डिजिटल घड़ी से बदल डाला. अभिभावक की गैरहाजिरी में, उसकी रखवाली करने के लिए कोई मतलब नहीं है. भेड़ियों से भरा जंगल दादी माँ के गुजरने के पहले ही विलुप्त हो जाएगा.


पोती, पहले से ही (यह कल ही समझाया गया था) वाई-फाई जैसा कुछ लगा रही थी. वो अदृष्य ज़बान हर जगह पहुंचती है, दीवारों से परे, इलेक्ट्रोमैग्नेटिस्म से सबकुछ चाटती है- सब्जियों से पानी, घड़ी का भीतरी हिस्सा, और दादी माँ की बूढी हड्डियां तक चाट जाती है. ये चाटना इस लिये चाटा जाता है ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि वे दुनिया भर में फैली गपशप का हिस्सा है या नहीं. वाई-फाई, लाई-फ़ाई, जंगली आग, उड़ती-आँख और अन्य अपनी तपस्या का भुगतान करने के लिये जूझते रहते हैं.


जब दादी माँ के बाबा ने उनके लिये ये घर बनाया, उनकी दाढी सफेद हो गयी थी, और जब जंगल को छिन्न भिन्न करने के लिये विदेशी प्रेम अड़ियल हो गया, जब उस व्यक्ति ने जवान पेड़ और घने ओक के पेड़ को एक ही तरह से काट कर गिरा दिया, वो भी घड़ी ले आए. घड़ी में समय बीतता गया, और वह लकड़ी काटता गया. पाखंड के झाड़-झंखाड़ से पिछले घावों को इकट्ठा करते हुए कुल्हाड़ी और घड़ी, टिक-टॉक और खटाक-खटाक चलती रही, घाव की जगह पर भट्ठी जलती रही और कालीन से ढंकी, बंद पड़ी दुनिया के हर खूंट को रगड़ती रही. भेड़िया चारों ओर जा-जा कर बर्फ सूंघता रहा, और गौरैया की हड्डियों और उसके नीचे एक इंडियन की हड्डियों को ढूंढ निकालता है. जिस शांति और निश्चिंतता को उनके बाबा ने खोजा था वो वहां शुरु से नहीं थी, बल्कि वो इंसान की बनाई हुई थी, एक नरसंहार और छूत की बीमारी के बाद दबा दी गयी तीखी खामोशी. गर्मी की हरियाली, पंछियों की चूं-चूं, पुराने पेड़ों के गिरने की आवाज़ के कोलाहल में, गर्मी के बहते पानी में आगे जाता, भेड़िये का इंतज़ार करता, मशरूमों की खरपतवार जो छाया बन गयी थी.फिर भी, उस छोटी सी दुनिया के सन्नाटे में वो सदा ही ऐसी थी.


लेकिन अब - इस चिंतातुर, लाल हुई, पोती को अब समय का एहसास हुआ. वाई-फाई, और पत्नी की आँख, सितारों का व्यास जानती है, युवा सितारों की वंशावली, यहाँ तक कि वह कारण भी जिसकी वजह से यहूदी खतना कराते हैं. और उपग्रह, उपग्रह को रात में निर्जन धरातल पर छोड़ कर, कामुक आँखों से हर चीज़ को देखती है. जंगलराज खत्म हो गया है. पत्नी की आँख हर चीज़ को पैकेटों में तराश देती है...या शायद पॉकेटों में (या जानने का कोई तरीका नहीं है कि पोती ने क्या कहा था). घड़ी मूर्खता का एक आभूषण मात्र है, जो टिक-टॉक की आवाज़ करती है, और भेड़िया केवल उसका साथ देता चल सकता है.


माइक्रोवेव बजता है, और लगता है पोती खाने के लिए कुछ पका रही है, शायद सूप. दादी को तब बहुत अच्छा लगता था जब पोती नन्ही थी और लगभग हर चीज़ से विस्मित हो जाती थी. जब वह मैदान से फूल उठाती थी, और मर्द के घुटनों पर सो जाया करती थी, डरावने सपनों के कारण रोते हुए उठ जाया करती थी कि भेड़िया डरावना लग रहा था.
एक अच्छी दादी माँ, पोती को आज के रूप में को पसंद करती. हालांकि, वह एक अच्छी दादी माँ नहीं है. उसका जंगली पत्नी होना भेदिये के स्वभाव का हिस्सा था.एक बेकार पड़े, बूढ़े हो रहे शरीर के बिस्तर के पास से देखते हुए. ये विश्वसनीय कॉलेज जाने वाली लडकी अपना सूप पका रही है.


ट्रे(आइवी लता के पैटर्न के साथ तांबे की बनी) के ऊपर चम्मच बजती है- वो जल्दी से पहुचती है. अभी जहां जिस जगल कोई भी घड़ी नहीं है, वह अजेय है. वह एक पत्नी जैसी नजर डालती है, और उनमें लाली भर लाती है. उस औरत को खुश रखने के लिये कोई भट्ठी नहीं, अल्मारी नहीं, बोर्ड नहीं, आग को कुरेदने वाली छड़ी नहीं, मिट्टी के बर्तन नहीं, मोम नहीं, लोहा नही, सन नहीं, मांस नहीं, क्रीम नहीं, लिंकन डगलस की बहस नहीं. वो चीज़े जो उसे चीजें खुश करतीं हैं वो मोनोसोडियम ग्लूटामेट(भोजन का स्वाद बढाने वाला) और कृत्रिम स्वीट्नर ऐस्पार्टेम, ग्राहकों का समर्थन, रियलिटी टीवी, टेट्रा पैक, डेटाबेस, गैलियम, कृत्रिम स्वीट्नर स्प्लेंडा और कम्प्यूटर से पैदा की गयी तस्वीरें हैं.


समय, जैसा कि हाल के दिनों में ही चलता रहा, ख़ुशी-खुशी चलता जाता है. न दरवाजा खुलने की कोई आवाज़ है, न फर्श पर कदमों की आवाज़ है. केवल पोती का चिकना चेहरा चाँद की तरह आता है, और चम्मच स्टील हो जाती है और कंपन एक बिजली की कौंध जैसा जो बेहद नज़दीक होकर भी अनदेखा जैसा है, जो गाय के पुट्ठे के मीट और लहसुन तथा आलू की महक ढूंढता है.


अगर खरपतवार के साथ जंगल भी बहुत बढ गया होता और पत्नी निगाहों से दूर हो गयी होती, भेड़िया सामने के दरवाजे या घड़ी के आरपार बाहर चला गया होता, सूप देने वाली सजातीय पर अपनी दाढ के साथ कूद पड़ता और उसकी रीढ को एक ही बार में दांतों से कूंच डालता, टैटू की हुई उसकी खाल को फाड़ डालता, और कंबल को खून से भिगो डालता.


दादी माँ चम्मच को पकड़ने के लिये कांपते हुए, अपने होंठ एक बंदर की तरह लटकाती है. कांपते हुए इसे पकड़ती है, सूप की गर्मी और चटपटापन उसके गले के नीचे उतरता है और एक बूंद उसकी ठोढी पर से फिसल पड़ती है.


धूमिल आँखो से, वो अपनी पोती को मुस्काते हुए देखती हैं. और उसकी आवाज़ में गर्मी है. "दादी माँ- आप की आंखें कितनी बड़ी है?"



मूल लेखक- (बेंजामिन रोसेनबाउम)     http://en.wikipedia.org/wiki/Benjamin_Rosenbaum

रविवार, 21 अप्रैल 2013

यदि होता.....

यदि होता सत्तासुर, तो मैं जनपथ में रहता,
खाकी वर्दी वाले होते, मन भी काला होता।

मीडियाजन गुण गाते रहते, दरवाजे पर मेरे,
चमचे तलवे चाटते रहते, संध्या और सवेरे।

आँख पे रखके काली ऐनक, कान में खूँट भरके,
चैन की बंसी बजा-बजा कर कान फोड़ता सबके।

यदाकदा आक्रोश जता कर, शर्मिंदा मैं होता,
यहाँ-वहाँ फिर घूम-घाम कर, करवट ले सो जाता।

बाँट-बाँट कर, लूट-लूट कर, भरता मैं भंडारे,
चापलूस और चरण चाट को रखकर सबके आगे।  

सोमवार, 21 जनवरी 2013

आओ मिल कर बेचे खायें......


तुम भी खाओ हम भी खायें, बन के पूरे पागल,
अभी तो सारा देश पड़ा है, बहुत बचे हैं जंगल।
जनता को रोटी के चक्कर में, कर डालो पागल,
रोते-रोते सो जायेगी सुसरी, नहीं करेगी दंगल।
हमने खाया, खूब पचाया, बैगन हो या बड़हल,
जनता मांगेगी तो दे देंगे, उसको बासी गुड़हल।
कपड़े सारे नोच लिये हैं, बचा ये हमरा आंचल,
इस पर आँख जमा रखी है, घूर रहे हो प्रतिपल।
पैरों में पड़ गयी बिवाई, दृष्य हो गया बोझिल,
वोट मांगने फिर से आ गये, लेकर पूरी बोतल।
मजा बड़ा अब आ रहा है, बजा रहे हो करतल,
थोड़ी सी तो कसर छोड़ दो, हो तुम कैसे अंकल।
आओ खेले करके फिक्सिंग, दिखे हो जैसे दंगल,
साथ-साथ रहेंगे हम सब, सोम हो या हो मंगल।
माल मजे का उड़ा के भइया, जनता को दो डंठल,
देखो फांका काट रहे हैं, हड़प के नोट के बंडल।
सड़क बनायी, बांध बनाया, सभी बनाया अव्वल,
हर ठेके में खूब कमाया, बरसे नोट के बंडल।।

बुधवार, 9 जनवरी 2013

मेघदूत...समर्पण

पिता जी की पुस्तक 'मेघदूत-भावानुवाद' से....साधिकार...

तुम यश:पूत, तुम कवि-कुल-गुरु,
मैं तुच्छ अकिंचन दिशाहीन,
तुम वाणी के वर्चस्वि-पुत्र,
मैं अभिव्यक्ति-सामर्थ्यहीन

तुम काव्य कला के सागर हो,
मैं हूँ, तितीर्षु भयभीत-मीन,
तुम यक्षराज से स्वर-साधक,
मैं अविवेकी, स्वर-हीन, दीन,

अपनी अञ्जलि में लाया हूँ,
तव कुसुमों की माला- नवीन,
अवगुण-गणना-निरपेक्ष इसे
स्वीकार करो हे! कविप्रवीण।।
      डॉ.अभय मित्र

रविवार, 23 दिसंबर 2012

रेयरेस्ट ऑफ रेयर....


मनीष तिवारी कल प्रेस कांफ्रेंस में कई बार बोले कि गृहमंत्री का बयान पढ़िये जिसमें "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" मानते हुये, बलात्कार के इस राजधानिक मामले पर कार्यवाही की जायेगी, वे आगे जोड़ते हैं कि कानून के जानकार यह जानते हैं कि इस वाक्यांश "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" का क्या मतलब होता है। मनीष क्या यह बतायेंगे कि...

1. अगर यह "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" मामला है जैसा कि गृहमंत्री अपने बयान में(प्रेस को जारी) स्वीकार कर रहे हैं  तो प्रेस कांफ्रेस स्पष्टीकरण के लिये नहीं बल्कि गृहमंत्री और गृहसचिव के इस्तीफे की पुष्टि के लिये बुलायी जानी चाहिये थी।(अगर इस देश का गृहमंत्री "रेयरेस्ट ऑफ रेयर"  मामले की जिम्मेदारी नहीं लेगा तो यूपीए की चीफ को ले लेनी चाहिये, परधनमंत्री तो बेचारु हैं।)

2. कानून के जानकार, जानकर क्या करेंगे ....मामला आम आदमी का है, बात उसके समझ में आनी चाहिये।

3. अगर किसी केन्द्रीय मंत्री या किसी भी राजनीतिक दल के महत्वपूर्ण नेता की बेटी के साथ ऐसा होता तो क्या कार्यवाही की जाती? 

4.आखिर वह कौन सा हादसा होगा जिस पर संसद का विशेष सत्र बुलाकर एक विशेष अध्यादेश जारी किया जायेगा। 

(अगर देश की आधी जनसंख्या के पीड़ित होने पर यह नहीं हो सकता है तो भारत द्वार-इंडिया गेट, पर युवा सही ही कह रहे थे कि "ये सरकार निकम्मी है, सोनिया जिसकी मम्मी है।", क्योंकि अगर चे, मम्मी और उनके कुनबे की सुरक्षा पर कुछ बोला तो मम्मी के चाटुकार उनकी सुरक्षा के लिये परिवार के बलिदानों की कहानियों की झड़ी लगा देंगे।)

5.आखिर कब तक हम मैंगो पीपुल इनके बलिदानों के पुरस्कार स्वरूप अपना बलिदान कराते रहेंगे। कल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी पत्रकार ने यह क्यों नहीं पूछा कि मनीष, शिंदे, आरपीएन..वगैरह-वगैरह अपनी सुरक्षा का बोझ देश से कम करने के बारे में क्या सोच रहे हैं, जिससे कि जनता की सुरक्षा बढ़ायी जा सके। हमारे किसी पत्रकार ने उनसे यह नहीं पूछा कि "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" मामले उनकी यानी, यूपीए चीफ, परधनमंत्री, और मंत्रिमंडल की कोई नैतिक जिम्मेदारी बनती है या सब घोल कर पी गये।

(कुछ बरस पहले देश के मंत्री की बिटिया को अगवा करके आतंकियों ने अपने भाइयों को छुड़वाया था, तब तो निर्णय बड़ी जल्दी ले लिया गया। यह प्रेस कांफ्रेस करने में सरकार को पांच दिन लग गये। प्रेस कांफ्रेस करने वाले कह रहे थे उनकी भी बेटियां हैं...क्या उनकी बेटियां बस में सफर करती हैं...क्या उनकी बेटियां भारत द्वार, रायसीना आदि जगहों पर थीं? हमें इन सुविधासंपन्न लोगो से किसी भी तरह की कोई भी हमदर्दी नहीं रखनी चाहिये।)

6. कि हमें क्या करना चाहिये....।

वैसे सुन लीजिये..झारखंड से खबर आ रही है कि ...पांच छिछोरों को लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला, तो सीख यह है कि जो छेड़खानी करे ...उसे वहीं पर धर दबोचिये...इंतज़ार मत करिये। 

(मुझे याद है जब हम छोटे थे तो हमारे इलाके के एक दरोगा किसी छिछोरे को पकड़ते थे तो उसके सर पर चौराहा बनवा देते थे (मानवाधिकार वाले तो उनको मार ही डालते) और किसी प्रभावशाली का फोन के आने तक उसकी कायदे से पूजा कर देते थे...जिससे कि ऊपर वालों को यह कह सकें कि साहब हमको क्या पता कि जनाब आपके सुपुत्र या रिश्तेदार हैं...हमने तो बस खुजली मिटा ली...।)

.......कहीं सरकार और उसकी व्यवस्था मैंगो से यह अपेक्षा तो नहीं कर रही है कि मैंगो, कानून अपने हाथ में ले लें......

.....वैसे हम आम जन को एक बात का ध्यान रखना चाहिये कि कोई भी व्यक्ति जो छेड़खानी भी कर रहा हो, उसकी वहीं धुनाई कर दीजिये...इंतज़ार मत करिये...क्योंकि न्याय में हो रही देरी (पीड़ित का इंतज़ार) वह मुख्य कारण है जिससे शोषण करने वाले का साहस बढ़ता है।जब एक बार जूता-लात खा कर छिछोरे का पेट भर जायेगा तो अगली बार कम से कम सोचेगा जरूर कि छिछोरपना करें या नहीं....






गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

FDI की बहस से निकले कुछ भूत......


कल आनंद शर्मा को संसद में यह कहते सुन कर बड़ा अजीब लगा कि हल्दीराम भी अपने स्टोर्स बाहर खोल रहा है, इसलिये हमें भी दूसरों को मौका देना चाहिये। कुछ ऐसा लगा कि मानो कोई हमे चुटकी काटने दे रहा है तो हमें उसको अपने हाथ काटने की इजाज़त दे देनी चाहिये। आनंद शर्मा जैसे लोग चरण वंदना करके क्या बन सकते हैं इसका उदाहरण आपके सामने है। हम समझ रहे थे आनंद शर्मा भारत सरकार के मंत्री हैं, लेकिन उनके इस तर्क से तो लगता है कि वे कम से कम भारत सरकार के तो मंत्री नहीं है, आने वाले समय में पता चलेगा कि वे किस देश के मंत्री हैं। कपिल सिब्बल कह रहे थे कि सिर्फ 18 शहरों में किराना स्टोर खुलेंगे, और बात ऐसे हो रही है मानो पूरे देश में इनकी बाढ़ आ जायेगी। तो कपिल साहेब ये 18 शहर देश के बाहर कर दिये आपने, कल आप यह तो नहीं कहेंगे न कि दिल्ली में चांदनी चौक में आतंकवादियों ने बम फोड़ा है इसलिये सारे देश को चिंतित होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि आपने दिल्ली और विशेष रूप से चांदनी चौक का निर्यात कर दिया है। सिब्बल की बाते सुन कर मुझे इतिहास की किताब के वे शब्द याद आ गया जब अंग्रेजों ने बंगाल, अवध आदि के नवाब से सीमित जगहों पर लगान वसूली की अनुमति मांगी थी....अंत क्या हुआ सबको मालूम है।

हमारे देश के ये मंत्री जितना मुँह खोलते है, उनकी औकात उतनी ही सामने आती जाती है। संसद की गरिमा पर लेक्चर देने वाला आदमी, विपक्षियों को जानवर कहता है। अन्ना को भगोड़ा कहने वाला मंत्री बन जाता है। देश को बेच डालने के लिये कुतर्क देने वाला वाणिज्य मंत्री बना दिया जाता है। ज़बान के इतने गंदे लोग भीतर से कितने गंदे होंगे इस बात का आप अंदाज़ ही लगा सकते हैं। कपिल सिब्बल के साथ ऐसे कितने ही किस्से मिल जायेंगे। इस पर तुर्रा ये कि ये हमारे समाज से आये हैं।


सरकार को FDI की कितनी जल्दी है इसकी बानगी एक बयान से और आती है जब आनंद शर्मा कहते है कि FDI पर काफी बहस हो चुकी है काफी समय बीत चुका है। तो भईया वॉलमार्ट के प्रवक्ता जी कुपया उन बिलो पर भी निगाह मारिये जो पचीस-पचीस साल से संसद की धूल फांक रहे हैं, जैसे लोकपाल, महिला आरक्षण और न जाने कितने। आनंद शर्मा वॉलमार्ट का समर्थन करते हुये अपनी कुहनी के बल बैठ कर संसद में कह गये कि "कंसेंसेस का मतलब आम सहमति है, सर्व सहमति नहीं...एंड इफ यू हैव टू वेट फॉर यूनानिमिटी, देन यू विल हैव टू वेट टिल एटर्निटी" Consensus ka matlab aam sehmati, sarva sammati nahi..If you have to wait for unanimity, you wait till eternity: Anand Sharma


तो प्रभु थोड़ा प्रकाश इधर भी डालिये, यह तथ्य भी थोड़ा स्पष्ट कर दीजिये कि महिला आरक्षण बिल पर आम सहमति का क्या मतलब है....मेरा ख्याल है वहां पर आम सहमति सर्व सहमति ही है...क्योंकि उसे "एटर्निटी" तक लटकाना है। इन जैसे बिलों पर सरकार को कतई जल्दी नहीं है, क्योंकि इनसे धनागमन नहीं जुड़ा है? ये कमअकल, इतना नहीं समझते कि अमरीका जैसे मुल्क सिर्फ और सिर्फ अपना भला देखते हैं और उनको आपके भाड़ मे जाने की भी चिन्ता नहीं है। वैसे मुझे तो लगता है कि ये खूब समझते हैं क्योंकि ये भी सोचते अमरीका की ही तरह हैं.....सिर्फ अपना भला देखो, देश का भला देखने को बहुत सारे लोग हैं।

आइये इनके बंधुओं और सखाओं पर एक दृष्टिपात कर ले....अर्थात...लालू, मालू, बहनालू और करुणालू....एक चारे का मारा, दूसरा अधिक कमाई का मारा, तीसरी पर घोटालों की तलवार, चौथा घोटालेबाजों के खानदान का मुखिया। इन चारों का ईमान सीबीआई के पास गिरवी है। इधर सीबीआई...आयी और इन सबकी धोती खुल जाती है। बहाना बचता है सांप्रदायिकता। बड़ी अजीब सी बात है धर्म और जात के नाम पर वोट मांगने वाले और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों का डर दिखाने वाले खुद को सेक्युलर कहते हैं। और उनको वोट देने वाला तबका इतने बरसो में नहीं जान पाया कि असली सांप्रदायिक कौन है। खैर वो भी समझेगा...। और फिर यहां FDI पर चर्चा के समय आप विरोध करते हैं लेकिन जब निर्णय लेने की बारी आती है तो दुम दबा के भाग लेते है, क्योंकि आपके हाथ तो दबे हैं। आप लोगों के इस निर्णय पर कोई भी तर्क टिक नहीं सकता। इन चारों ने सरकार की नाक नहीं बचायी है, इन्होने अपनी जान बचायी है।

सारांश यह है कि चाहे FDI हो या CBI सरकार की अपनी जिद है, क्योंकि सरकार के कर्ताधर्ता अपने तक सीमित हैं और इलेक्शन को वोटर मैनेजमेंट से अधिक कुछ नहीं समझते। उनके लिये लोकतंत्र एक प्रबंधन है जिसे हर पांच साल पर सेट किया जाता है। उनके लिये राजनीति एक पेशा है जो कमाई करने के लिये अपनाया जाता है।


मंगलवार, 13 नवंबर 2012

अब तो छोड़ो...


दीन हीन और याचक बन कर, साबित क्या करना है तुमको?
उठों गर्व से, लड़ो तो तम से, लड़ कर मरना बेहतर है।
सदियों से तुम दबे रहे, तो वर्तमान को कोसोगे?
या फिर इसी वर्तमान के सीने पर रण छेड़ोगे?
नाम तुम्हारा ले ले कर, पीट रहे जो छाती हैं,
सबका अपना स्वार्थ लगा है, सबके पोते नाती हैं।
सत्ता की वे चाट मलाई, छुरी पीठ पर घोप रहे हैं,
नाम व्यवस्था का लेकर के, खाल तुम्हारी खीच रहे हैं।
कब समझोगे, अब न समझे, तो झुंड बना ले जायेंगे,
अब तक जो कुछ बचा रहा है, वो मिल बांट के खायेंगे।
फर्क नहीं पड़ता इससे, कि तुम नर हो या फिर नारी हो,
गूंज उठी है रणभेरी अब, समय बड़ा ही भारी है।
साम, दाम हो दंड, भेद हो, कोई भी तरकीब चुनो,
अपना तुम अब लक्ष्य चुनो, कोई तो हथियार चुनो।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

दुराग्रह



एक चश्मा है, टूटा-फूटा ही सही अपना है।
जिसे पहन मैं पुरजोर वक़ालत करता हूँ
लोग कुछ भी कहें मैं पानी को आग कहता हूँ
और इसे साबित करने को
एंजिल को खुदा कहता हूँ
कुंए में रहता हूँ, इसे ही मैं समुंदर कहता हूँ
यहीं से मैं आकाश देख लिया करता हूँ
तारे भी गिन लेता हूँ, आकाश माप लिया करता हूँ
मैं जो कहता हूँ वो जोर-जोर से कहता हूँ
काला है तो हुआ करे, उसको मैं लाल लाल करता हूँ,
मेरा जो फलसफा है उसको मैं आलातरीन कहता हूँ
तुम कुछ भी कहो उसे मैं बकवास ही कहता हूँ।
तुम मेरे साथ हो तो मैं तुमको प्यार भी करता हूँ
लगाया दिमाग तो दांत काट लेता हूँ
मरा नहीं हूँ, झुका भी नहीं करता हूँ।
क्या हुआ जो उकड़ूँ बना बैठा हूँ।
सावन का अंधा हूँ पर लाल-लाल लखता हूँ।
खुलेपन से नफरत है, सो दीवारें खड़ा करता हूँ।
न मानो तुम, नफरत करो,
मैं तो मनवाने को विचार आयात किया करता हूँ।
भूख का दिखा कर डर, उन्हें फुसलाकर,
रक्तबीजों को भी अधिकार (?) दिला देता हूँ।
खून के रंग से है प्यार मुझे,
इसलिये समझ लो मैं क्या-क्या नहीं किया करता हूँ।