रविवार, 6 मार्च 2016

रोहित वेमुला और समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब विद्यार्थियों के लिए मगरमच्छी आँसू बहाने वाले राजनीतिक दलों की असली नीयत का जीता-जागता उदाहरण है, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का प्रवेश

दो बरस पहले आरक्षित सीट पर किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारते हुए एडमीशन लेने वाले और दिलाने वाले सवर्ण लोगों को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्षा के एडमीशन पर क्या कहना है? इलाहाबाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा है - उनका उत्पीड़न इस लिए हो रहा है क्योंकि उन्होने योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम का पुरजोर विरोध किया था - और कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि दो बरस पहले के इस प्रकरण पर आज कार्रवाई क्यों?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा जी कृपया ये बताएं कि दो बरस पहले आपने किसी हरिजन या ओबीसी का हक मारा तब आपने उनके उत्पीडित होने के बारे में क्यों न सोचा? आज आपको अपने उत्पीड़न की चिंता हो रही है? समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के उन विद्यार्थियों के साथ हो रही ज्यादती का विरोध तक क्यों नहीं किया? आपको लाभ हो रहा था इसीलिए न?  यही एक कारण हो सकता है। आप जानकार न थी यह कोई वजह नहीं हो सकती, और अगर उस (जानकारी न होने के) कारण को मान भी लें तो आज आप उस गलती को सुधारने का बजाए राष्ट्रपति को पत्र लिख कर आदर्श संघर्ष के किस मानक की स्थापना कर रही हैं? आप विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक ऐसी अध्याक्षा हैं जिसने समाज के हाशिये पर बैठे, पीड़ित और सताए हुए गरीब घरों के विद्यार्थियों का हक मारा है। और तो और हमने सुना है कि हरिजनों और ओबीसी के लिए ज़ार-ज़ार रोने वाले कांग्रेसी और वामपंथी दलों ने आपका चुनाव में समर्थन भी किया था?

और वे लोग जो दो बरस बाद की जाने वाली संभावित जांच पर सवाल उठा रहे हैं तो उनसे मेरा यह पूछना है कि वे किस परम्परा को जन्म दे रहे हैं क्या त्रुटि या अपराध का पता लगने पर उसके सुधार या दंड का प्रावधान करने से पहले यह देखना चाहिए कि वह कितने पहले हुआ था? यानी कि पुरानी घटी घटनाओं और हादसों के लिए उत्तरदायी जीवित लोगों को मात्र इसलिए बक्श दिया जाना चाहिए कि वह घटना पुरानी हो गयी? क्या किसी पीड़ित और सताए हुए गरीब घर के विद्यार्थी के हक मारने वाले और फिर पकड़े जाने पर इधर-उधर के बहाने लगाकर उत्पीड़न का आरोप लगाने वाले को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाना चाहिए कि उसका एडमीशन दो बरस पहले हुआ था (भले ही गलत तरीके से हुआ हो)।

मैं मानता हूँ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्षा का कैरियर भी दांव पर है और वे भी विद्यार्थी भी है लेकिन उनके आरोप-प्रत्यारोप भरे व्यवहार से स्पष्ट है कि उन्होने अपना कैरियर चुन लिया है। सो वे बेहतर स्थिति में हैं कि अपने सही और आदर्श निर्णय से समाज में एक नई राजनीतिक और सामाजिक न्याय से ओतप्रोत पहल का उदाहरण प्रस्तुत करें। यह पहल कैसी होगी, ऐसी होगी या वैसी होगी... इसे देश के युवाओं को इस्तेमाल करने वाली राजनीति तय करेगी या वे स्व-निर्णय लेंगी... आने वाला समय ही बता पाएगा।







कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें