मंगलवार, 13 नवंबर 2012

अब तो छोड़ो...


दीन हीन और याचक बन कर, साबित क्या करना है तुमको?
उठों गर्व से, लड़ो तो तम से, लड़ कर मरना बेहतर है।
सदियों से तुम दबे रहे, तो वर्तमान को कोसोगे?
या फिर इसी वर्तमान के सीने पर रण छेड़ोगे?
नाम तुम्हारा ले ले कर, पीट रहे जो छाती हैं,
सबका अपना स्वार्थ लगा है, सबके पोते नाती हैं।
सत्ता की वे चाट मलाई, छुरी पीठ पर घोप रहे हैं,
नाम व्यवस्था का लेकर के, खाल तुम्हारी खीच रहे हैं।
कब समझोगे, अब न समझे, तो झुंड बना ले जायेंगे,
अब तक जो कुछ बचा रहा है, वो मिल बांट के खायेंगे।
फर्क नहीं पड़ता इससे, कि तुम नर हो या फिर नारी हो,
गूंज उठी है रणभेरी अब, समय बड़ा ही भारी है।
साम, दाम हो दंड, भेद हो, कोई भी तरकीब चुनो,
अपना तुम अब लक्ष्य चुनो, कोई तो हथियार चुनो।

1 टिप्पणी:

  1. शानदार! फिर एक बार बहुत बढ़िया लिखा है आपने...
    "अपना तुम अब लक्ष्य चुनो, कोई तो हथियार चुनो!"
    मेरे ख्याल से लोकतंत्र में सत्ताधीशों का मद उतारने और उन्हें ज़मीन पर लाने के लिए वोट से बेहतर, सरल और प्रभावी हथियार कोई नहीं है. समस्या बस ये है कि लोग पांच सालों तक खूब शोर मचाते हैं, आक्रोश व्यक्त करते हैं, लेकिन मतदान के दिन चूक जाते हैं. ये आक्रोश मतों में व्यक्त हो जाए, तो परिवर्तन दूर नहीं. आशा है कि आपकी रचना उस आक्रोश को सही दिशा देने में सहायक होगी.

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