रविवार, 28 अक्तूबर 2012

मजीद मेमन और नैतिकता की लचीली परिभाषा...


सुप्रभात...

आप लोगों को नही लगता कि कई सारे वकीलों के राजनीति में अच्छे पदों पर काबिज़ हो जाने से राजनीतिक परिदृष्य अदालती अधिक लगता है। अधिकांश राजनेता जो विभिन्न चैनलों पर बहसों में हिस्सा ले रहे हैं उनकी बाते ऐसे तर्कों से भरी होती हैं जो आम आदमी की समझ से परे होती हैं। कल माजिद मेमन साहब, 'टाइम्स नाव' टीवी चैनल पर कुमार विश्वास जी को समझा रहे थे कि क्यों गडकरी जी पर प्रिवेन्शन ऑफ करप्शन ऐक्ट लागू नहीं होता।
मेरी समझ में नहीं आता कि राजनीति वकालत के पेशे में घुस गयी है या वकालत राजनीति के पेशे में, मेमन साहब समझा रहे थे कि नैतिकता और शुचिता के मायने लचीले हैं, अर्थात समय और परिस्थिति के साथ बदलते हैं।
बचपन से हमने तो सीखा है कि सत्य वह है जो हर परिस्थिति और देश काल में सही है, नैतिकता वह है जो जो हर परिस्थिति और देश काल में नैतिक है लेकिन अपनी सुविधा से इनकी परिभाषाओं को गढ़ना अवश्य ही ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की पढ़ाया गया होगा। हमारे देश में तो हमारे गुरुजनों ने यही सिखाया था कि बेटा ये चीज़े काल और समय से परे होती हैं।

कहीं माजिद मेमन साहब का यह कहना तो नहीं है कि उस समय के अनुसार पैगम्बरों ने जो नैतिक मानक स्थापित किये और धार्मिक किताबों में लिखा, वे अब बेमानी हैं और उनका पालन समीचीन नहीं है। वे किताबों के लिये ठीक हैं, उनका पालन करना अब समयानुकूल नहीं है। कहीं मिजिद साहब यह तो नहीं कहना चाहते कि रिश्ते भी समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं, क्योंकि अगर माँ-बाप इस फलसफे के हिमायती होते तो माजिद साहब जैसे लोग तो जवानी का नज़ारा ही न कर पाते, और क्या यही बात वे अपने बच्चों को भी सिखा रहे हैं। 

यहां पर यह दलील नहीं दी जा सकती कि, नेताओं के चरित्र और नैतिकता पर की जा रही चर्चा का परिपेक्ष्य(कॉन्टेक्स्ट) दूसरा है क्योंकि अगर कोई यह कहता है कि सत्य, नैतिकता और शुचिता मेरी सुविधा के अनुसार चलते हैं तो उसको किसी ऐसे समाज को खोज लेना चाहिये जहां पर उसकी इस दलील को सही माना जा सके। जो बात हमारे आपके घर परिवार के लिये सही है वही समाज, गाँव, कस्बे, तहसील, जिले, प्रदेश और देश के लिये सही है। 
एक वकील या कोई भी पेशेवर जब राजनीति में आता है तो जनता, समाज और देश की सेवा के लिये आता है और उसका चरित्र (सर्वकालीन), उसकी नैतिकता (सर्वकालीन) और ईमानदारी (सर्वकालीन) आम जनता, समाज और देश के लिये महत्वपूर्ण है। जब वह नेता बनता है तो उसकी जिम्मेदारी इसलिये भी बढ़ जाती है कि अब समाज उसकी ओर आशा भरी निगाहों से देखेगा, उसका अनुसरण करेगा। लेकिन अगर वही वकील या पेशेवर से राजनीतिज्ञ बने नेता यह भूल जायें कि उसके कर्त्वय क्या हैं और सिर्फ अधिकारों की बात करें और दुहाई दे कि समाज का हिस्सा हूँ समाज जैसा ही दिखता हूँ, मेरी नैतिकता और शुचिता देशकाल के अनुसार बदलती है तो फिर तो इसका मतलब हुआ कि कल को वह देश को बेच खायेगा, क्योंकि कल को उसकी बदली हुई नैतिकता कहेगी कि 'देश को बेच खाना नैतिकता है, और तो और वो कल को अदालत में साबित भी कर देगा कि यह सही है'

पता नहीं ये लोग, नेता, वकील, कारोबारी, अधिकारी देश को क्या समझते हैं, और ये कब सुधरेंगे? क्या तरीका हो सकता है इनके नेक्सस को तोड़ने का....क्रांति-व्रांति की बात मत करिये, क्योंकि जिन जगहों मे पिछले 1000 सालों में क्रांतियां हुई हैं...वे स्वर्ग नहीं बन गये हैं....हाँ वहां के निवासी स्वर्गवासी जरूर बन गये हैं। 

।।जय हो।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. हालांकि, राजनीति तो जीवन के हर क्षेत्र में है और वकील भी राजनीति में हमेशा से रहे हैं, लेकिन ये बात बिलकुल सही है कि जिस तरह की भूमिका राजनीति में अधिकाँश वकील अब निभा रहे हैं, वह अभूतपूर्व है. आज़ादी से पहले क़ानून की जानकारी का उपयोग अंग्रेज़ों को उन्हीं के क़ानून का उपयोग कर परास्त करने, क्रांतिकारियों के मुकदमे लड़ने आदि के लिए किया जाता था. आज़ादी के बाद उसका उपयोग देश की क़ानून-व्यवस्था के निर्धारण और सरकार व संसद के संचालन के लिए किया जाता रहा. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा लगने लगा है कि अब क़ानून की जानकारी और वकालत का अनुभव केवल भ्रष्टाचारी आकाओं को बचाने और हर गलत कार्य को सही साबित करने का कौशल बनकर रह गया है. अधिकाँश वकील अब क़ानून के जानकार कम और भ्रष्टों के प्रवक्ता ज़्यादा लगने लगे हैं.
    पढ़ा तो हमने भी यही था कि कुछ तत्व देश-काल-परिस्थिति की सीमा से परे होते हैं और वे कभी नहीं बदलते, लेकिन संभव है कि "शर्मनिरपेक्षता" की नई परिभाषा में कहीं ऐसा लिखा हो, कि अगर सत्य को नहीं बदला जा सकता, तो असत्य को ही सत्य कहा जाए, नैतिकता का पालन नहीं कर सकते, तो जो भी अनैतिक कर रहे हैं, उसी को नैतिकता का नाम दे दिया जाए. जैसे अपने देश में छद्म-धर्मनिरपेक्षता है, शायद वैसे ही छद्म-नैतिकता भी है, जो लचीली होती है. हम और आप अभी उसे समझने में अक्षम हैं क्योंकि हम अभी तक अपनी "सांप्रदायिक" और "दकियानूसी" सोच से छुटकारा नहीं पा सके हैं.

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  2. श्रीमती गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में संसद में वकीलों की संख्या काफी हुआ करती था फिर कामराज वाले मामले के बाद इंदिरा जी को लगा कि देश और पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध लोगों से बेहतर होगा नेता प्रतिबद्ध लोगों को दल में शामिल करना बस वहीं से कांग्रेस दल-दल में बदलना शुरु हो गयी।

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